पिछले कुछ महीनों के कालखंड की अगर गहराई से विवेचना की जाये तो एक बात साफ़ तौर पर उभर कर सामने आती है की क्या हम पूरे तौर पर होमोसेपियंस (विकसित मानव) बन पाए हैं? मानवशास्त्री इसकी दुहाई करीब दो सौ वर्षों से दे रहे और लगातार दावे कर रहे हैं की सेपियन्स का चोला इंसानों ने 5 हज़ार साल पहले उतार फेंका है. और यकीनी तौर पर उसे होमोसेपियंस के ख़िताब से नवाज़ा जा सकता है. अब अगर उनके दावों की सच्चाई में जाएं और इसकी गहराई से पड़ताल कर विकास के सही मायने को समझने की कोशिश करें तो इसका जवाब अधिकांश स्तरों पर हाँ हो सकता है. पर क्या इतना काफी है और इसे अंतिम परिणति मान चुप बैठा जा सकता है. 





जीवनस्तर की बात करें तो यकीनी तौर पर बेहतर हुआ है, होमोसेपियंस काल के खानाबदोश और कबिलाई जीवन से इतर अब हमने अपने लिए एक स्थाई और सुरक्षित आशियाना बनाया है. जहाँ अपने परिवार और स्वयं को महफूज़ रख रहे हैं. आजीविका की भी स्थाई व्यवस्था की गई है. भोजन के लिए अब जंगल, नदियों और शिकार का आसरा नहीं है. रहन-सहन बेहतर, संतानों के लिए पूरी तरह से जिम्मेदार, कुछ हद तक सामाजिक सरोकार से भरे और परोपकार जैसी मानवीय भावनाओं से लबरेज़ भी रहे. फिर न जाने पिछले ४० से ५० सालों में विशेष तौर पर हिंदुस्तान के सन्दर्भ में ऐसा क्या हुआ कि एक-एक कर सभी मानवीय भावनाएं धीरे-धीरे तिरोहित होने लगी या कहें थम सी गई. संयुक्त परिवार एक-एक कर बिखरने लगे, इसकी जगह एकल परिवारों ने ले ली, रिश्तों में पहले जैसी गर्माहट नहीं रही, रिश्ते चाहे कितने करीबी ही क्यों न हो माता-पिता के स्तर पर भी डेकोरेटिव लैमिनेट और अनमने से हो गए. हमने इसे ही विकासवाद मान अपने होंठ और आत्मा दोनों सील लिए और तथाकथित विकास के रास्ते चल दिए.
वो तो भला हो कोरोना नामक वायरस का जिसने हमारे विकास के इस मॉडल को outdated करार देकर एक बार फिर हमे जीवन को करीब से समझने का एक अवसर दे रहा है. क्या हम समझ पाएंगे, या कुछ दिनों में इसे भूलकर फिर अपने रस्ते मगन हो जायेंगे? सोचियेगा जरूर। ...............................................
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If we think deeply about the period of the last few months, one thing clearly emerges that have we become fully homosepians (evolved human beings)? Anthropologists have been citing this for nearly two hundred years and are constantly claiming that humans have taken away the sapiens' couture 5000 years ago. And of course he can be awarded the title of Homosepians. Now if we go into the truth of his claims and try to understand the true meaning of development by examining it deeply, then the answer can be yes on most levels. But is this enough and can be kept silent as the final culmination.
Talking about the standard of living is definitely better, we have now made a permanent and safe home for ourselves, apart from the nomadic and tribal life of the Homosepian era. Where we are keeping my family and myself safe. Permanent arrangements have also been made for livelihood. There is no longer a forest, rivers and hunting grounds for food. Better living, fully responsible for the children, to some extent filled with social concerns and also with human emotions like philanthropy. Then do not know what happened in the last 40 to 50 years, especially in the context of India, that one by one all the human emotions slowly started to disappear or were halted. Joint families began to disintegrate one by one, it was replaced by single families, the relationship was not as hot as it was, no matter how close the relationship was at the parental level to the decorative laminate and unmanner. We considered it developmentalism, sealed both our lips and soul and walked the path of so-called development.
It is good that the virus called Corona, which has outdated this model of our development, is once again giving us an opportunity to understand life closely. Will we be able to understand, or will we forget it in a few days and then enjoy our way? YOU SHOULD definitely think
Ya this is true. Very nice
ReplyDeleteआदिमानव जंगल नदियों और शिकार पर आश्रित था परंतु विकसित मानव जंगल और नदियों पर आश्रित होते हुए भी दानव बन कर उन्हें नष्ट करने में लगा रहा। इन दोनों में विकसित मानव किसे कहा जाए?
ReplyDeleteचीन को धन्यवाद दिया जा सकता है कि उसने प्रकृति की रक्षा करने में पूरे विश्व की मदद की है चीन से वायरस अगर नहीं फैलता तो पर्यावरण का सैनिटाइजेशन कैसे हो पाता?
और यही बात परिवार पर भी लागू होती है।
योगेंद्र यादव बिलासपुर
आदिमानव जंगल नदियों और शिकार पर आश्रित था परंतु विकसित मानव जंगल और नदियों पर आश्रित होते हुए भी दानव बन कर उन्हें नष्ट करने में लगा रहा। इन दोनों में विकसित मानव किसे कहा जाए?
ReplyDeleteचीन को धन्यवाद दिया जा सकता है कि उसने प्रकृति की रक्षा करने में पूरे विश्व की मदद की है चीन से वायरस अगर नहीं फैलता तो पर्यावरण का सैनिटाइजेशन कैसे हो पाता?
और यही बात परिवार पर भी लागू होती है।
योगेंद्र यादव बिलासपुर
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ReplyDeleteVery nice article
ReplyDeleteVary nice
ReplyDeleteYeah , We will forget it in few days/months/ years and then enjoy our way . It's seems like 🙏
ReplyDeletevery nice. Bade ache tarike se Aapne samaj k uper comment kiya hai.👌👌
ReplyDeleteVery true 👌 nice article 👍.
ReplyDelete👌
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